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21 August 2012
My Interview in Indiantelevision.com
04 July 2012
… और मेरा घर टूट गया
.. और मेरा घर टूट
गया। टूटने से यहां मतलब है, कि हालातों के आगे, समय के आगे, और ख़ुद को उपयोगी
बनाए रखने की मांग के आगे मेरा घर टूट गया…। जो लोग मेरे घर तैलंग भवन से परिचित नहीं
है, उन्हें में बता दूं, कि मेरे शहर टीकमगढ़ मघ्यप्रदेश का तैलंग भवन यानि मेरा
घर एक जाना माना ठिकाना था.. इसकी इमारत का कोई ऐतिहासिक महत्व नहीं था, लेकिन
मज़ाल है कि रिक्शे वाले ने कभी पूछा हो, कि भाईसाब ये कहां पड़ता है। कई बार तो
चिठ्ठियां सिर्फ Surname के दम पर ही इस घर में चलीं आती थीं.. अड़ौस पड़ौस के लाग
अपने अपने पते पर, लिखते थे, "तैलंग भवन" के सामने, आगे या पीछे, ताकि
ये सुनिश्चित हो जाए, कि उनकी चिठ्ठी सही जगह पहुंच जाएगी। Postman को भी बड़ी
आसानी हो जाती थी, वो सारे मोहल्ले की चिठ्ठियां हमारे यहां डाल जाता था, क्योंकि
लगभग हर चिठ्ठी पर लिखा होता था, तैलंग भवन के पास.. उसके बाद हमारी Duty हो जाती
थी, कि वो चिठ्ठियां सही ठिकानों तक पहुंचा दें.. जिन घरों में जवान लड़कियां होती
थीं, उनकी चिठ्ठियां पहुंचाने में हमें कुछ ज़्यादा ही दिलचस्पी रहती थी। मेरा वो
घर अब शायद अपने अंतिम दिनों में है...
बुढ़ापे का परिणाम
लगभग एक सा होता है.. चाहे बूढ़ा इंसान हो, या बूढ़ा मकान.. या तो वो टूट जाता है,
या बिक जाता है… आखिर मेरा घर भी कब तक अपने आपको बचाए रखता, बूढ़ा जो हो चला था।
बुढ़ापे को अक्सर अपनी उपयोगिता सिद्ध् करती रहनी पड़ती है, मेरा घर भी कई सालों
से ये कोशिश कर रहा था, वो लगातार ये एहसास दिला रहा था, कि अभी भी वो उपयोगी है,
वो बार बार बुलाता था, कि आओ देखो, मेरी मोटी मोटी दीवारों में आज भी वही गर्मी और
प्यार है, जिसके बीच तुम पले बढ़े हो। लेकिन कहीं न कहीं घर ये जानता था, कि नए मकानों
के लटकों झटकों में उसकी पारंपरिकता को कौन पूछेगा। उसे ये एहसास तो हो गया था, कि
वो एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है..। मैं जब भी Mumbai से उस घर में जाता तो उसे
मेरे आने की खुशी तो होती थी, लेकिन इस बात की आशा कतई नहीं होती थी, कि अब उसका
भला होगा। क्योंकि अक्सर उड़ते उड़ते आवाज़ें उसकी दीवारों तक भी पहुंच जाती थीं,
और दीवारों के तो कान होते ही है.. मैं अक्सर Mumbai के चिकने घरों और सुविधाओं की
बातें करता था, अक्सर मुंह से निकल जाता था, कि अब इस घर में पैसा लगाना बेकार
है.. तो वो सिर झुकाए चुपचाप कसाई के बकरे की तरह कातर निगाहों से देखता था, कि
उसकी गर्दन पर छुरा कब पड़ेगा। वो अब अपने आपको भी देखने लगा था.. उसकी दीवारों
में POP की चिकनई नहीं थी, उसके दरवाज़े खुलते बंद करते समय आवाज़ करते थे, कोई
कमरा ऊंचा था तो कोई नीचा.. और दरवाजों की चौखटें इतनी नीची की दिन में एक दो बार
सिर फूटना तो आम बात थी.. लेकिन फिर भी जीवन की आशा तो मरते हुए इंसान के मन में
भी होती है। उसे इस बात का एहसास था, कि वो हमें याद दिलाने में कामयाब हो जाएगा,
कि उसके पास आज भी वो बड़ा आंगन है, जहां घर के बच्चे खेला करते थे, औरतें शाम को
हंसी ठिठोली किया करती थी, और जहां बिना मौकों पर भी हारमोनियम और ढोलक बज उठते
थे.. जहां सारा परिवार अपने सुख दुख बांटता था, एकदूसरे के घर जाने से पहले पूछना
नहीं पड़ता था.. उसे पता था कि उसका दिल बड़ा है, और शायद इसी दम पर वो अपनी साख
बचाए रख सकता है और हमें अपने महत्वपूर्ण होने का एहसास दिला सकता है... लेकिन
आजकल जब इंसानों के दिल की कोई कीमत नहीं तो मकानों का दिल कौन देखता है। मेरा घर ये
नहीं समझ पा रहा था, कि यही जीवन है, हम जिन बुज़ुर्गों की सीख पर चलकर बड़े होते
हैं, बाद में उन्ही सीखों में हमें रूढ़ीवादिता और पिछड़ापन नज़र आने लगता है.. ये
समय का फेर है, इससे भला आजतक कोई बचा है..?
जब मेरा घर बना था,
तब इस सोच के लोग थे, कि घर की आधी रोटी भली.. इसीलिए मेरे घर में भी रोनक रहती
थी, छतों से लेकर सीढ़ियों पर कोई न कोई मौजूद होता ही था। हर उम्र के, हर स्वाभाव
के, हर तबके के घर के सदस्य.. लेकिन समय का ऐसा फेर हुआ कि मैं मुंबई चला आया, और
देखते देखते घर की आधी भली की सोच मिट गई, लोगों के लिए रास्ता खुल गया, उन्हें
बड़े घर में घुटन होने लगी, शहर के छोटे मकानों में तरक्की का एहसास होने लगा.. और
देखते देखते भीड़भाड़ वाला घर खाली होता गया.. और हालत ये हुए, कि उस घर में कमरे
ज़्यादा और रहने वाले कम हो गए.. मोहल्ले की रोनक हमारा घर अब शाम होते ही एक बड़ी
अंधेरी छाया नज़र आने लगा..
लोग कहते हैं, कि मेरे
घर को किसी की नज़र लग गई। आज वो खाली है, कोई रहने को तैयार नहीं.. नई पीढ़ी में
कुछ एक को छोड़कर तो बाकी किसी को उसके अंदर के रास्ते भी पता नहीं होंगे..। अब ये
तो पता नहीं किसी की नज़र लगी या नहीं, लेकिन ये बात भी है, कि हमने अपने घर की कभी
नज़र भी नहीं उतारी.. हो सकता है, जब किसी की नज़र लग गई हो जब जब वहां साहित्यकार
गर्व के साथ बैठकर अपनी रचनाएं पढ़ते थे, संगीत की महफिलें, कवि गोष्ठियां,
चर्चाएं, हंसी, ठहाके तैलंग भवन के अंदर से निकल निकल कर आसपास के घरों को मुंह
चिड़ाते थे.. एक तरह से टीकमगढ़ शहर का सांस्कृतिक अड्डा था, लोग सलाहें लेने आते
थे, शहर में कोई नामी कलाकार आता था, तो उसे अपने आप हमारे घर लाया जाता था, जैसे
मेरा घर किसी राजा की चौखट हो, जहां पर सलाम करके जाना ज़रूरी है... लेकिन राजा की
चौखट न सही, लेकिन राजगुरू का घर था तैलंग भवन। हम पीढ़ियों से औरछा राज्य के
राजवंश के राजगुरू थे… जी हां वही ओरछा जहां के महलों के सामने Katrina Kaif Slice
का Juice पीती नज़र आती हैं, उसी राज्य के राजा हमारे यहां सर झुकाकर आते थे,
चप्पले पहन कर आना राजा को भी Allowed नहीं था.. मगर वक्त ने राजाओं को खत्म कर
दिया फिर हमारे इस अदने से घर की क्या बिसात..
ये शेर तो आप सब ने
सुने ही होंगे..
याद रख, सिकंदर के हौसले तो आली थे
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे
जब गया था दुनिया से दोनों हाथ खाली थे
अब न वो सिकंदर है
और न उसके साथी है
जंगजू न पोरस है और न उसके हाथी है
जंगजू न पोरस है और न उसके हाथी है
कल जो तनके चलते थे
अपनी शान-ओ-शौकत पर
शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुर्बत पर
शम्मा तक नहीं जलती आज उनकी तुर्बत पर
ऐसा दुनिया में पहली
बार नहीं हो रहा था, कि हमारा घर हमसे दूर हो रहा हो.. दरअसल ऐसा सारे देश में ही
हुआ है, या हो रहा है, पुराने घर अब सभी से दूर हो रहे हैं.. क्योंकि अब पुराने
घर, आंगन, तुलसी का पौधा, आम का पेड़, हमें सुकून तो देते हैं, लेकिन जीवन की
सुविधाएं, सुरक्षा और पैसा नहीं दे पाते.. और सुकून से दिल तो बहल सकता है, लेकिन
घर नहीं चलता.. इसलिए सभी अपने छोटे शहर के बड़े घरों से दूर होते होते, बड़े शहर
के छोटे घरों में आने को मजबूर हो गए। और बड़े घर इस बदलाव पर हैरानी से हमें
देखते हैं, कि न जाने कहां कब क्या हो गया...। हमारे घर के दूर होने पर भले ही
हमें दुख लगे, लेकिन उसका भविष्य हमेशा की तरह उज्जवल ही है। आज उसमें रहने वाले
वाशिंदों का भले ही पलायन हुआ हो, और वो दूसरे शहरों में बस गए हों, लेकिन सबका
भला ही हुआ है। और ये ज़रूरी था, गतिशील होना विकास की निशानी है, क्योंकि गति में
ही प्रगति है। बहता पानी हमेशा अच्छा होता है, रूका पानी सड़ जाता है, खून जब तक
धमनियों में बहता रहता है, जीवन चलता रहता है, रूक जाता है, तो उस अंग को खराब कर
देता है.. एक फूल गिरता है तो चार नए खिलते हैं, प्राचीन को नवीन के लिए जगह बनानी
ही पड़ती है। आज भले ही तैलंग भवन में रहने वाले वाशिंदे बदल रहे हों, और वो इसे
इसके मौजूदा हाल में रखें या फिर पुनर्निमाण करें, तैलंग भवन को एक नया रूप
मिलेगा, उसमें नई उर्जा का संचार होगा..। हर व्यक्ति के साथ की एक समय सीमा होती
है, हमारे अपने भी कुछ समय बाद हमसे बिछड़ जाते हैं, इसी तरह जीवन चलता है, और इसी
तरह तैलंग भवन भी चलेगा, भले ही उसका स्वरूप दूसरा हो, नाम भी दूसरा हो, लेकिन
उसकी आत्मा वही रहेगी.. मैंने कौन बनेगा करोड़पति के लिए कुछ पंक्तियां लिखीं थी,
जो मैं अपने घर को समर्पित करना चाहता हूं –
अपना घर अपने जीवन
का आधार है, जिंदगी भर की मेहनत का आभार है, बरसों की उम्मीदों का आकार है,
घर की हर चीज़ में
यादों का बसेरा होता है, बुर्जुगों की दुआओं का डेरा होता है,
और अपने घर में
एहससास भी वैसा होता है, जैसे कोई बच्चा अपनी मां की गोद में आ के सोता है…
मेरा घर जिसके साथ भी
रहे, हमेशा आबाद रहे..
RD Tailang
©
Sequin Entertainment Pvt. Ltd 2012.
Mumbai
30 June 2012
"Bollywood का बवासीर"
बवासीर का दर्द कैसा होता है, मुझे नहीं मालूम,
क्योंकि मुझे कभी नहीं हुआ.. लेकिन शायद कुछ वैसा ही होगा, जैसा की फिल्मी
हस्तियों को Bollywood शब्द सुनकर होता है। कहते हैं, कि Bollywood मत कहो.. ये
एकदम वैसा ही Reaction है, जैसे कि एक Serial "हम पांच" में एक अधेड़
महिला, Aunty कहने पर शिकायत करती थी, कि Aunty मत कहो.. उसी तरह से आजकल बड़े
बड़े Super Stars, Directors, Writers कहते हैं, Bollywoo मत कहो।
वैसे Bollywood शब्द न कहने देने के पीछे इनकी
बहुत अच्छी सोच है। इन Anti Bollywood वाले लोगों का मानना है, कि ये शब्द ऐसा
लगता है, कि जैसे हमने Hollywood से Copy कर लिया हो…। ह ह ह हंसी तो इतनी आ रही
है, कि Blog में से हंसी की आवाज़ आने लगे.. ये तो गांव के ज़मीदार ठाकुर वाली बात
हो गई, कि उसे नीची जाति की गांव की जवान लड़की के साथ हमबिस्तर होने में, उसका
बलात्कार करने में परहेज नहीं है, लेकिन उसे अपने कुंए से पानी नहीं भरने देगा..
इन्हें Hollywood की Copy Bollywood से परहेज है,
लेकिन Hollywood की पूरी कहानी, उनके Heros के
Look, उनकी DVD और यहां तक कि उसके Posters की Copy करने में कोई परहेज नहीं है।
इन्हें Bollywood सुनने में दर्द होता है, लेकिन
हिंदी में बात करने में गर्व नहीं होता। इन्हें हिंदी फिल्म जगत कहना पसंद
है..लेकिन हिंदी की Script, English में पढ़ना अच्छा लगता है। जो Bollywood इन्हें
Hollywood की Copy नज़र आता है, उसी Hollywood
के लिए एक Extra बनने में ये जान लगा देते हें।
मैंने एक Bollywood विरोधी को पकड़ा और पूछा कि
आखिरी क्या बात है, Bollywood में ऐसी कौन सी मिर्ची लगी है, जो सुनते ही जलन होने
लगती है..। उनके श्रीमुख से जो शब्द निकले वो शायद आसाराम बापू या रामदेव भी बताने
में असमर्थ रहते..। वे कहते हैं "इस
देश की एक महान संस्कृति रही है, कि जिसका खाओ, उसी की बजाओ..। इस नीति से बहुत
भला होता है। एक तो खिलाने वाले का एहसान नहीं चढ़ता, चढ़ेगा भी कैसे, जिसने खाना
खिलाया, अगर उसी के खाने की बुराई कर दी जाए, तो खिलाने वाला "नमक का
कर्ज़" जताने की बजाए, Backfoot पे चला जाता है, उसे लगता है, कि उसने गंदा
खाना खिला दिया। इसीतरह यदि Hollywood पे Based Bollywood की इतनी बुराई कर दी
जाए, कि Hollywood को भी लगे कि ये हिंदी फिल्म वाले हमसे चिड़ते हें, तो ये
बेचारे हमारी फिल्मों को क्या चुराते होंगे..।"
फिर एक नई नवेली अभिनेत्री थीं, जिनसे मैंने
Hollywood Bollywood विवाद के बारे में कुछ बात करने की ज़रूरत नहीं समझी थी,
लेकिन फिर भी उन्होंने जबरदस्ती अपनी राय को मेरे पीछे लगा दिया.. उनकी राय मुझसे
बोली.. कि देखिए, फिल्मी दुनिया में किसी चिड़ना, cool होने की निशानी है.. अगर आप
Anurag हैं, और Amitabh से चिड़ते हैं, यानि आप Cool हैं, अगर आप Salman हैं, और
Press से चिड़ते हैं, तो भी cool हैं.. अगर आप RamGopal Varma हैं, और Karan Johar
से चिड़ते हैं, तो Super cool हैं, इसीलिए आपको अगर फिल्म Line में cool बनना है,
तो Bollywood शब्द से बहुत बुरी तरह से चिड़ना होगा..
ये तर्क सुनकर मुझे भी Bollywood से बहुत चिड़
होने लगी, और जैसे ही मुझे चिड़ मची, तो मुझे अपने अंदर एक ठंडक का एहसास हुआ.. और
ये Mumbai का मौसम बदलने के कारण नहीं था, मैं अचानक Cool हो रहा था.. ठंडा ठंडा
cool cool..
तभी अचानक किसी ने पीछे से कहा – भाई साब ये
Bollywood में एक बहुत ही धांसू Hero आया है..
मैंने उसे घूर के देखा, और कहा Bollywood..?
तेरी…
RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt.Ltd.
Mumbai
18 October 2011
Steve दादा नहीं रहे...
स्टीव दादा नहीं रहे... कौन Steve? अरे भई Apple वाले Steve Job दादा नहीं रहे… पूरी दुनिया में मातम छा गया... लोगों को अपने दादा के मरने का शायद उतना ग़म न हो, जितना Steve दादा का हुआ...। सब रोने लगे... जिनके पास भी iphone, iMac, ipad, ipod.. जो भी था, वो रो रहा था… अखवार रो रहे थे, Channel रो रहे थे... कुछ लोग इसलिए भी रो रहे थे, ताकि वो ये साबित कर सकें, कि वो भी Steve दादा का Product इस्तेमाल करते हैं…
लोग कह रहे थे, कि तीन सेवों ने यानि Apples ने दुनिया बदल दी… एक Apple Adam और Eve ने खाया था, तो दुनिया बन गई… दूसरा Apple Albert Einstein के सर पर गिरा तो दुनिया को गुरूत्वाकर्षण यानि Gravity का पता चला… तीसरा Apple Steve दादा का था, जिसने Computers और phone की दुनिया बदल दी… वो बात अलग है, कि पहले दो सेवों की करतूतों ने आम दुनिया को फायदा पहुंचाया, लेकिन Steve भईया के Apple का उन्ही लोगों को पता था, जो इस बात को मानते थे, An apple in a day keep doctors away… आम आदमी का तो Apple से तभी वास्ता पड़ता है, जब वो लड़की वाला बन कर लड़के वालों को सगाई के समय 1 किलो सेव भेंट देता है… इन एक किलो सेवों का महत्व सगाई की सोने की अंगूठी से कम नहीं होता…
तो अपने Steve भईया ने भी हमें एक Apple दिया… हांलांकि वो जूठा Apple था… कुतरा हुआ.. अब पता नहीं, कि वो Steve ने कुतरा, या फिर चूहे ने… लेकिन हम सब खुश होते रहे… कि भले जूठा हुआ तो क्या हुआ, किसी ने हमें सेव लायक तो समझा… और हम Steve भईया के जूठे Apple को पाकर खुश होते रहे… पहले Apple बड़े बड़े देशों में Launch होता, जब वो खा खा के थक जाते… तब जा के Apple भारत में आता… लेकिन हम खुश हो जाते… और मन को समझा लेते… कि कोई बात नहीं… पहले अमरीका और इंगलेंड Apple खा लें, फिर बचेगा तो हमें भी मिल जाएगा… Steve दादा ने कभी ये नहीं सोचा, कि भारत का बाज़ार भी बड़ा है, और वहां भी उनके सेव अच्छे खासे बिक सकते हैं… कुछ लोगोँ को तो Apple खाने का इतनी तलब लगती… कि वो चोरी छिपे लाया हुआ Apple ही खा लेते… और उसे बड़ी शान से हाथ में लेकर घूमते, और बताते भी, कि ये वही Latest Apple है, जिसे India में launch करने लायक नहीं समझा गया, लेकिन उन्होंने किसी तरह जुगाड़ कर लिया है… और उसे Break करके वेा इस्तेमाल भी करने लगे हैं… बचपन में चुरा के तो हमने भी Apple खाए हैं, लेकिन हमेशा कोशिश यही थी, कि किसी को पत न लग जाए… लेकिन ये Steve भ्ईया का Apple था, कोने के ठेले वाले बंसी लाल का नहीं…
लेकिन कुछ भी हो, Steve दादा के जाने का दुख हमें भी हुआ… अनाथ थे, लेकिन आदमी अच्छे थे… भारत भी आ चुके थे, हांलांकि भारत में उनके अनुभव ज्यादा अच्छे नहीं रहे… सुनते हैं, उस समय उन्हें किसी सन्यासी ने ठग लिया था… वैसे ये बात नई नहीं थी, सन्यासी हमेशा से ही लोगों को ठगते आ रहे हैं, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी चमत्कार के नाम पर… पर Steve दादा को इस बात का दुख हुआ, और उन्होंने फिर कभी पलट कर यहां नहीं देखा… हो सकता है, इसीलिए… उनके Apple सारी दुनिया में तो बिकते, लेकिन भारत में देर से ही आते… ठीक वैसे… जैसे कोई नई फिल्म शुक्रवार को तो महानगरों में release होती हैं, लेकिन गांव खेड़ों के सिनेमा Hall में दो चार हफ्ते के बाद ही पहुंचती है… Steve दादा के लिए, भारत भी किसी गांव खेड़े से कम नहीं था…
हमारे हिसाब से Steve दादा की बनाई हुई चीज़ों में बहुत सी कमियां थीं… लेकिन हालत ऐसी कि मज़ाल है कोई कमियां निकाल दे… लोग ऐसे react करते, जैसे किसी को Modern Art समझ नहीं आती, या English Film जिन्हें समझ नहीं आती, तो दूसरे उसे कैसी हीन भावना से देखते हैं… भले उन्हें भी समझ न आई हो… मैंने एक Apple fan से पूछा, कि भाईसाब, आपके Phone में तो कुछ Basic Feature ही Missing हैं… तो उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे नाके के किसी पनवाड़ी ने MF Husssain की Painting खरीद ली हो… बोला, अगर Apple खाना है, तो जैसा है वैसा खाओ…
Steve दादा की सफलता का यही आलम था… जैसे हम अपनी कमियों को ऊपर वाले की कृपा मानकर संतोष कर लेते हैं, कि ऊपरवाले ने अगर टांग तोड़ दी है, तो कुछ सोच कर ही तोड़ी होगी… क्योंकि भगवान जो कुछ करता है अच्छा ही करता है… उसी तरह Steve दादा जो बनाते हैं, अच्छा ही बनाते हैं… ये स्थान प्राप्त कर लेना, जिंदगी में बहुत बड़ी उपलब्धि है, कि जब लोग आपकी कमियां मानने और देखने को तैयार न हों… ये चमत्कार Steve दादा ने कर दिखाया, ये वाकई बहुत बड़ी बात है… मैं Steve दादा का Fan नहीं रहा, लेकिन वो जहां भी हैं, जैसे भी हैं, उन्हें बहुत बहुत श्रृद्धांजलि…
Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011
लोग कह रहे थे, कि तीन सेवों ने यानि Apples ने दुनिया बदल दी… एक Apple Adam और Eve ने खाया था, तो दुनिया बन गई… दूसरा Apple Albert Einstein के सर पर गिरा तो दुनिया को गुरूत्वाकर्षण यानि Gravity का पता चला… तीसरा Apple Steve दादा का था, जिसने Computers और phone की दुनिया बदल दी… वो बात अलग है, कि पहले दो सेवों की करतूतों ने आम दुनिया को फायदा पहुंचाया, लेकिन Steve भईया के Apple का उन्ही लोगों को पता था, जो इस बात को मानते थे, An apple in a day keep doctors away… आम आदमी का तो Apple से तभी वास्ता पड़ता है, जब वो लड़की वाला बन कर लड़के वालों को सगाई के समय 1 किलो सेव भेंट देता है… इन एक किलो सेवों का महत्व सगाई की सोने की अंगूठी से कम नहीं होता…
तो अपने Steve भईया ने भी हमें एक Apple दिया… हांलांकि वो जूठा Apple था… कुतरा हुआ.. अब पता नहीं, कि वो Steve ने कुतरा, या फिर चूहे ने… लेकिन हम सब खुश होते रहे… कि भले जूठा हुआ तो क्या हुआ, किसी ने हमें सेव लायक तो समझा… और हम Steve भईया के जूठे Apple को पाकर खुश होते रहे… पहले Apple बड़े बड़े देशों में Launch होता, जब वो खा खा के थक जाते… तब जा के Apple भारत में आता… लेकिन हम खुश हो जाते… और मन को समझा लेते… कि कोई बात नहीं… पहले अमरीका और इंगलेंड Apple खा लें, फिर बचेगा तो हमें भी मिल जाएगा… Steve दादा ने कभी ये नहीं सोचा, कि भारत का बाज़ार भी बड़ा है, और वहां भी उनके सेव अच्छे खासे बिक सकते हैं… कुछ लोगोँ को तो Apple खाने का इतनी तलब लगती… कि वो चोरी छिपे लाया हुआ Apple ही खा लेते… और उसे बड़ी शान से हाथ में लेकर घूमते, और बताते भी, कि ये वही Latest Apple है, जिसे India में launch करने लायक नहीं समझा गया, लेकिन उन्होंने किसी तरह जुगाड़ कर लिया है… और उसे Break करके वेा इस्तेमाल भी करने लगे हैं… बचपन में चुरा के तो हमने भी Apple खाए हैं, लेकिन हमेशा कोशिश यही थी, कि किसी को पत न लग जाए… लेकिन ये Steve भ्ईया का Apple था, कोने के ठेले वाले बंसी लाल का नहीं…
लेकिन कुछ भी हो, Steve दादा के जाने का दुख हमें भी हुआ… अनाथ थे, लेकिन आदमी अच्छे थे… भारत भी आ चुके थे, हांलांकि भारत में उनके अनुभव ज्यादा अच्छे नहीं रहे… सुनते हैं, उस समय उन्हें किसी सन्यासी ने ठग लिया था… वैसे ये बात नई नहीं थी, सन्यासी हमेशा से ही लोगों को ठगते आ रहे हैं, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी चमत्कार के नाम पर… पर Steve दादा को इस बात का दुख हुआ, और उन्होंने फिर कभी पलट कर यहां नहीं देखा… हो सकता है, इसीलिए… उनके Apple सारी दुनिया में तो बिकते, लेकिन भारत में देर से ही आते… ठीक वैसे… जैसे कोई नई फिल्म शुक्रवार को तो महानगरों में release होती हैं, लेकिन गांव खेड़ों के सिनेमा Hall में दो चार हफ्ते के बाद ही पहुंचती है… Steve दादा के लिए, भारत भी किसी गांव खेड़े से कम नहीं था…
हमारे हिसाब से Steve दादा की बनाई हुई चीज़ों में बहुत सी कमियां थीं… लेकिन हालत ऐसी कि मज़ाल है कोई कमियां निकाल दे… लोग ऐसे react करते, जैसे किसी को Modern Art समझ नहीं आती, या English Film जिन्हें समझ नहीं आती, तो दूसरे उसे कैसी हीन भावना से देखते हैं… भले उन्हें भी समझ न आई हो… मैंने एक Apple fan से पूछा, कि भाईसाब, आपके Phone में तो कुछ Basic Feature ही Missing हैं… तो उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे नाके के किसी पनवाड़ी ने MF Husssain की Painting खरीद ली हो… बोला, अगर Apple खाना है, तो जैसा है वैसा खाओ…
Steve दादा की सफलता का यही आलम था… जैसे हम अपनी कमियों को ऊपर वाले की कृपा मानकर संतोष कर लेते हैं, कि ऊपरवाले ने अगर टांग तोड़ दी है, तो कुछ सोच कर ही तोड़ी होगी… क्योंकि भगवान जो कुछ करता है अच्छा ही करता है… उसी तरह Steve दादा जो बनाते हैं, अच्छा ही बनाते हैं… ये स्थान प्राप्त कर लेना, जिंदगी में बहुत बड़ी उपलब्धि है, कि जब लोग आपकी कमियां मानने और देखने को तैयार न हों… ये चमत्कार Steve दादा ने कर दिखाया, ये वाकई बहुत बड़ी बात है… मैं Steve दादा का Fan नहीं रहा, लेकिन वो जहां भी हैं, जैसे भी हैं, उन्हें बहुत बहुत श्रृद्धांजलि…
Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011
23 September 2011
नाक के बाल
सदियों तक गुमनामी के अंधेरे, पिछड़ेपन, और इंसानी उपेक्षा में जीने के बाद, अचानक एक दिन, नाक के बालों ने विद्रोह कर दिया…। दबा हुआ दर्द विद्रोह बन कर फूट पड़ा… नाक के बालों ने नाक में दम कर दिया…। उनका एक मुखिया बाल बढ़कर… नाक से मूंछों तक पहुंच गया… और कहने लगा… "इंतज़ार, धैर्य, सहने की भी हद होती है… सदियां हो गईं, इंसान की नाक की तंग, अंधेरी और सीलन भरी गलियों में सड़ते हुए… आजतक इंसान ने हमारे बारे में कुछ सोचा…? तुम्हारे सर के बालों की तरह हम भी बाल है… पर हमें इतने सालों से इंसान की नाक में रह कर क्या मिला…? सिर के बालों को इतना मान और हमें अपमान…? सर के बालों के लिए तरह तरह के तेल, Lotion Cream, conditioner… और हमें… बहती हुई नाक का गटर…?
सिर क्यों… हमसे कुछ ही दूरी पर, मूछों के बाल… उन्हें एंठकर तुम अपनी मर्दानगी दिखाते हो… और वहां से थोड़ी ही दूर पर हम ऐसे… जैसे अंबानी की इमारत के आसपास झुग्गी झोपड़ी… आखिरी बाल से बाल का भेदभाव क्यों… ? हम वो बाल हैं, जो तुम्हारी सांसों में धूल, कचरे को तुम्हारे फेंफड़ों तक पहुंचने से रोकते हैं, वर्ना अब तक दम घुट कर मर गए होते…? सर के बाल बढ़ते हैं, तो तुम उनको संवार कर, अपनी Style पे इतराते हो… लेकिन हम बढ़कर नाक से झांकने भी लगें तो तुम कैंची अंदर तक घुसा कर हमारी गर्दनें काट देते हो, क्यों? अपनी नाक की शान तो तुम्हें इतनी है कि अगर तुम्हारी नाक पे बात आ जाए, तो तुम किसी की जान लेने में नहीं हिचकिचाते… फिर नाक के बालों की इतनी तौहीन क्यों…? "
मैंने नाक के बढ़े हुए बाल को प्यार से सहलाया, थोड़ा बहलाया, और बोला… "भाई मेरे हमारे मन में बाल के प्रति कोई भेदभाव नहीं है… दरअसल हमारा तुम पर आज तक ध्यान गया ही नहीं…।" वो बोला… "आखिर जाएगा भी कैसे… जो हम तुम्हारे Vote bank नहीं हैं न.. हम तुम्हारी सुंदरता में इज़ाफा नहीं करते, हम माथे पर बिखरकर तुम्हारी जुल्फें नहीं कहलाते… तुम लोग उन्हीं पर ध्यान देते हो… जो तुम्हारे सामने हैं… जिनसे तुम्हारी Image बनती है… लेकिन वो तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखते, जो तुम्हारे आगे लहराते नहीं है… अगर ऐसा ही होता… तो आसाम, मणिपुर, मिजोरम, अरूणाचल जैसे राज्य भी उसी तरह इतराते जैसे MP UP राजस्थान इतराते हैं… दरअसल तुम्हारे लिए, पूर्वी राज्य भी नाक के बाल ही हैं…"
मैंने कहा – "नहीं यार, हम क्या करें… हम क्या करें… हमने तुम्हें नाक के अंदर थोड़े ही डाला है, ये तो ऊपर वाले ने तुम्हें वहां जगह दी है…।" बाल बड़े ताव में बोला.. "वाह, अब भगवान के ऊपर ठीकरा फोड़ दिया… अरे भगवान ने तो भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, भेदभाव, अत्याचार, इन सबको तुमसे दूर रखा था, उसे तो तुम कहां से उठाकर अपने पास ले आए…। तुम लोगों को जब भी मौका मिलता है, तुम अपने हिसाब से चीज़ें जमा लेते हो… तब भगवान याद नहीं आते… आज भगवान की दुहाई दे रहे हो…?"
अब वो गुस्सा कम और दुखी ज़्यादा लग रहा था… ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आंखें नम हो गई हों… उसने कहा – "हमने आज तक कोई Demand नहीं की… हम जिंदगी भर तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल वक्त आने पर झड़ जाते हैं… लेकिन हम आखिर तक तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल, मौका मिलते ही अपना रंग बदल लेते हैं… लेकिन हम आखिरी दम तक काले रहते हैं… फिर भी हमारे बारे में तुमने एक पल भी नहीं सोचा होगा…"
मैने अपनी उपेक्षा को एक Philosophy का रंग देने की कोशिश की… मैंने कहा कि – "देखो, इमारत के कंगूरे की हर कोई तारीफ करता है, लेकिन ईमारत जानती है, कि अगर वो आज सीधी खड़ी है, तो नींव के पत्थरों की वज़ह से…।" वो एकदम से भड़क गया… बोला.. "कब तक ये बातें कर कर के मेहनत करने वालों को उल्लू बना कर जिंदगी भर गढ्ढे में धकेलते रहोगे…? तुम्हारी इसी फालतू Philosophy की वजह से कंगूरे के पत्थरों की तरह चापलूस लोग, दुनिया की चकम दमक में जिंदगी भर फायदे की मलाई खाते हैं… तारीफ पाते हैं, और अपनी चमकीली किस्मत पे इतराते हैं… और मेहनती नींव के पत्थर सदियों से ज़मीन के नीचे दफन पड़े होकर खुश होते रहते हैं, कि वो इमारत को खड़ा रखे हैं… वो बुद्धू ये नहीं जानते हैं, कि उन्हें वेवकूफ बनाया गया है… और बलिदान का पाठ पढ़ाकर, प्यार से दफनाया गया है…"
नाक के बाल के तर्को के आगे मेरी नाक झुक चुकी थी… ऐसा लग रहा था, कि अब ये बाल मेरी सांसें बंद कर देंगे… लेकिन नाक के बाल ने वापस नाक में घुसते हुए कहा… "ये ज़रूरी नहीं, कि तुम हमें सर पे बिठाओ… लेकिन इतना ध्यान रखो, कि जो तुम्हारी पीठ पीछे मेहनत करते हैं, उनको भी कभी कभी याद कर लिया करो… आखिर नींव के पत्थर भी सांस लेते हैं…!!"
Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011
सिर क्यों… हमसे कुछ ही दूरी पर, मूछों के बाल… उन्हें एंठकर तुम अपनी मर्दानगी दिखाते हो… और वहां से थोड़ी ही दूर पर हम ऐसे… जैसे अंबानी की इमारत के आसपास झुग्गी झोपड़ी… आखिरी बाल से बाल का भेदभाव क्यों… ? हम वो बाल हैं, जो तुम्हारी सांसों में धूल, कचरे को तुम्हारे फेंफड़ों तक पहुंचने से रोकते हैं, वर्ना अब तक दम घुट कर मर गए होते…? सर के बाल बढ़ते हैं, तो तुम उनको संवार कर, अपनी Style पे इतराते हो… लेकिन हम बढ़कर नाक से झांकने भी लगें तो तुम कैंची अंदर तक घुसा कर हमारी गर्दनें काट देते हो, क्यों? अपनी नाक की शान तो तुम्हें इतनी है कि अगर तुम्हारी नाक पे बात आ जाए, तो तुम किसी की जान लेने में नहीं हिचकिचाते… फिर नाक के बालों की इतनी तौहीन क्यों…? "
मैंने नाक के बढ़े हुए बाल को प्यार से सहलाया, थोड़ा बहलाया, और बोला… "भाई मेरे हमारे मन में बाल के प्रति कोई भेदभाव नहीं है… दरअसल हमारा तुम पर आज तक ध्यान गया ही नहीं…।" वो बोला… "आखिर जाएगा भी कैसे… जो हम तुम्हारे Vote bank नहीं हैं न.. हम तुम्हारी सुंदरता में इज़ाफा नहीं करते, हम माथे पर बिखरकर तुम्हारी जुल्फें नहीं कहलाते… तुम लोग उन्हीं पर ध्यान देते हो… जो तुम्हारे सामने हैं… जिनसे तुम्हारी Image बनती है… लेकिन वो तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखते, जो तुम्हारे आगे लहराते नहीं है… अगर ऐसा ही होता… तो आसाम, मणिपुर, मिजोरम, अरूणाचल जैसे राज्य भी उसी तरह इतराते जैसे MP UP राजस्थान इतराते हैं… दरअसल तुम्हारे लिए, पूर्वी राज्य भी नाक के बाल ही हैं…"
मैंने कहा – "नहीं यार, हम क्या करें… हम क्या करें… हमने तुम्हें नाक के अंदर थोड़े ही डाला है, ये तो ऊपर वाले ने तुम्हें वहां जगह दी है…।" बाल बड़े ताव में बोला.. "वाह, अब भगवान के ऊपर ठीकरा फोड़ दिया… अरे भगवान ने तो भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, भेदभाव, अत्याचार, इन सबको तुमसे दूर रखा था, उसे तो तुम कहां से उठाकर अपने पास ले आए…। तुम लोगों को जब भी मौका मिलता है, तुम अपने हिसाब से चीज़ें जमा लेते हो… तब भगवान याद नहीं आते… आज भगवान की दुहाई दे रहे हो…?"
अब वो गुस्सा कम और दुखी ज़्यादा लग रहा था… ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आंखें नम हो गई हों… उसने कहा – "हमने आज तक कोई Demand नहीं की… हम जिंदगी भर तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल वक्त आने पर झड़ जाते हैं… लेकिन हम आखिर तक तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल, मौका मिलते ही अपना रंग बदल लेते हैं… लेकिन हम आखिरी दम तक काले रहते हैं… फिर भी हमारे बारे में तुमने एक पल भी नहीं सोचा होगा…"
मैने अपनी उपेक्षा को एक Philosophy का रंग देने की कोशिश की… मैंने कहा कि – "देखो, इमारत के कंगूरे की हर कोई तारीफ करता है, लेकिन ईमारत जानती है, कि अगर वो आज सीधी खड़ी है, तो नींव के पत्थरों की वज़ह से…।" वो एकदम से भड़क गया… बोला.. "कब तक ये बातें कर कर के मेहनत करने वालों को उल्लू बना कर जिंदगी भर गढ्ढे में धकेलते रहोगे…? तुम्हारी इसी फालतू Philosophy की वजह से कंगूरे के पत्थरों की तरह चापलूस लोग, दुनिया की चकम दमक में जिंदगी भर फायदे की मलाई खाते हैं… तारीफ पाते हैं, और अपनी चमकीली किस्मत पे इतराते हैं… और मेहनती नींव के पत्थर सदियों से ज़मीन के नीचे दफन पड़े होकर खुश होते रहते हैं, कि वो इमारत को खड़ा रखे हैं… वो बुद्धू ये नहीं जानते हैं, कि उन्हें वेवकूफ बनाया गया है… और बलिदान का पाठ पढ़ाकर, प्यार से दफनाया गया है…"
नाक के बाल के तर्को के आगे मेरी नाक झुक चुकी थी… ऐसा लग रहा था, कि अब ये बाल मेरी सांसें बंद कर देंगे… लेकिन नाक के बाल ने वापस नाक में घुसते हुए कहा… "ये ज़रूरी नहीं, कि तुम हमें सर पे बिठाओ… लेकिन इतना ध्यान रखो, कि जो तुम्हारी पीठ पीछे मेहनत करते हैं, उनको भी कभी कभी याद कर लिया करो… आखिर नींव के पत्थर भी सांस लेते हैं…!!"
Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011
19 September 2011
KBC 5 Opening Speech 16 Aug 2011
आज मैंने कौन बनेगा करो़ड़पति की शुरूआत में, श्री अमिताभ बच्चन के लिए ये पंक्तियां लिखीं… वो KBC के Set पे आकर, ये पंक्तियां बोलते हैं…
मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… यूं तो मैं, देश के कोने कोने में घूमा फिरा… कभी देखा एक छोर, तो कभी छुआ दूसरा सिरा… मगर मैंने हिंदुस्तान यहां महसूस किया है…
हमें जो लाखों Calls मिले, वो महज़ आकड़े नहीं थे… उसमें थी मंज़िलें, किसी के सपने यहीं थे… किसी में छिपी थी मां की बीमारी… कोई बच्चे को दिखाना चाहता था दुनिया सारी… इस खेल ने जीवन को कितना दिया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…
यहां खिलाड़ी साथ लाता है अपना गांव… पीपल की छांव, कौवे की कांव कांव… शहरों की रंगत भी यहां आती है… गांव की संगत में वो भी खिलखिलाती है… यहां सबके सपने एक होते हैं… एक की हार पे, दिल सभी के रोते हैं… ये खेल जब भी आता है, किसी का घर बन जाता है, कोई कर्ज उतर जाता है, कहीं जीवन संवर जाता है... इस खेल ने जीवन को कितना दिया है, मैं यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…
मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… यूं तो मैं, देश के कोने कोने में घूमा फिरा… कभी देखा एक छोर, तो कभी छुआ दूसरा सिरा… मगर मैंने हिंदुस्तान यहां महसूस किया है…
हमें जो लाखों Calls मिले, वो महज़ आकड़े नहीं थे… उसमें थी मंज़िलें, किसी के सपने यहीं थे… किसी में छिपी थी मां की बीमारी… कोई बच्चे को दिखाना चाहता था दुनिया सारी… इस खेल ने जीवन को कितना दिया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…
यहां खिलाड़ी साथ लाता है अपना गांव… पीपल की छांव, कौवे की कांव कांव… शहरों की रंगत भी यहां आती है… गांव की संगत में वो भी खिलखिलाती है… यहां सबके सपने एक होते हैं… एक की हार पे, दिल सभी के रोते हैं… ये खेल जब भी आता है, किसी का घर बन जाता है, कोई कर्ज उतर जाता है, कहीं जीवन संवर जाता है... इस खेल ने जीवन को कितना दिया है, मैं यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…
मी भ्रष्ट आहे
और एक दिन वही हुआ, जिसका मुझे डर था… अचानक अन्ना ने आंदोलन छेड़ दिया… कि अब इस देश में भ्रष्टाचार नहीं चलेगा… दिल पे गाज़ तो गिरनी ही थी… भ्रष्टाचार की जिस संस्कृति में हम पैदा हुए, पले, बढ़े, जवान हुए... उसके विकास में अपना भी योगदान दिया… अन्ना ने आकर अचानक उसे बुरा कह दिया और बोला कि आज से ऐसा करना खराब है… ये तो वही बात हो गई… कि जिस पत्नी के साथ इतने दिनों गुज़ारे हों… पड़ौसी आकर एक दिन बोल दे.. कि वो तो डायन है… मन कैसे मानेगा इस बात को… पर अन्ना कह रहे हैं, इसलिए मानना भी पड़ा, कि भ्रष्टाचार हमारे लिए वाकई बुरा है…
अन्ना से पहले हमें अपने भ्रष्टाचारी होने पर कितना गर्व था… हमारा आत्मविश्वास किस हद तक ऊंचा था, हम बिना Insurance की गाड़ी बेधड़क चलाते थे… क्योंकि हमें विश्वास था, कि अगर पकड़े जाएंगे, तो 50 रूपये से ज़्यादा नहीं लगेगा… देश का ऐसा कौन सा युवा है, जिसने बिना Driving License की गाड़ी नहीं चलाई हो… कभी पकड़े भी गए… तो 20 रूपये से ज़्यादा किसी हवलदार ने Demand नहीं की… आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है, हर टोपी वाला हवलदार अन्ना नज़र आता है… गाड़ियां निकालने में डर लगता है… वो 50 रूपये वाला आत्मविश्वास खत्म हो गया है… पहले Road पे बिना Papers की गाड़ी भी जिस शान से लहराते हुए चलते थे… आज हाथ कांपने लगे हैं… ईमानदारी ने आत्मविश्वास पर ज़बरदस्त चोट की है… और देश के विकास के लिए, उसके नागरिकों का आत्मविश्वासी होना बहुत ज़रूरी होता है…
आज सारा देश कह रहा है, "मैं भी अन्ना…" जो खा रहा है वो भी अन्ना कहता है, और जो खिला रहा है वो भी अन्ना है… जब सारा देश अन्ना है, तो भ्रष्ट कौन है…? जब एक अन्ना दूसरे अन्ना को नहीं खिलाएगा, तो कौन खिलाएगा… ?
अन्ना की वजह से, हमारी तो सारी पढ़ाई ही बेकार हो गई… हिंदी के Papers में हमने " जेब गरम करना" जैसे मुहावरों का अर्थ बता बता कर, कितने Marks हासिल किए थे… लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होते ही, ये सारे मुहावरे भी निरर्थक हो जाएंगे… टेबिल के नीचे से लेना, ऊपरी कमाई, रंगे हाथों पकड़े जाना… जैसे सारे वाक्य अचारक खत्म हो जाएंगे, जो अभी तक हमारी पढ़ाई लिखाई का एक हिस्सा थे…
अन्ना को क्या है… अन्ना को Passport नहीं बनवाना… उन्हें राशन कार्ड भी नहीं चाहिए… वो गाड़ी भी Drive नहीं करना… बच्चों का Admission भी नहीं कराना… और तो और वो 15 -16 दिन भूखे भी रह सकते हैं… इसलिए वेा बिना भ्रष्टाचार के रह सकते हैं… वर्ना उनसे कहिए… Agent को बिना 2500 रूपये दिए Driving License बनवा लें तो मान लेंगे देश में ईमानदारी आ चुकी है… या फिर जिन्होंने रामलीला मैदान में किरण बेदी का अभिनय देखा है… वे अपने अपने शहर में जाकर, सारे Traffic नियम पाल रहे होंगे, या लौटते समय, चालू टिकट लेकर, Reservation डब्बे में न घुसे होंगे … तो समझेंगे अन्ना सफल हो गए हैं, और भ्रष्टाचार खत्म हो गया है…
पर मानना पड़ेगा अन्ना को… भ्रष्टचार भले खत्म हो या न हो… उन्होंने देश के उस युवा वर्ग को कमरे से बाहर ला दिया, जो दिन भर Face book के बैठा बैठा… या तो Photo upload करता रहता था, या Chat में लगा रहता था… टोपी भले Fashion से ही सही, लेकिन Anna ने सबको टोपी पहना ही दी…
अन्ना से पहले हमें अपने भ्रष्टाचारी होने पर कितना गर्व था… हमारा आत्मविश्वास किस हद तक ऊंचा था, हम बिना Insurance की गाड़ी बेधड़क चलाते थे… क्योंकि हमें विश्वास था, कि अगर पकड़े जाएंगे, तो 50 रूपये से ज़्यादा नहीं लगेगा… देश का ऐसा कौन सा युवा है, जिसने बिना Driving License की गाड़ी नहीं चलाई हो… कभी पकड़े भी गए… तो 20 रूपये से ज़्यादा किसी हवलदार ने Demand नहीं की… आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है, हर टोपी वाला हवलदार अन्ना नज़र आता है… गाड़ियां निकालने में डर लगता है… वो 50 रूपये वाला आत्मविश्वास खत्म हो गया है… पहले Road पे बिना Papers की गाड़ी भी जिस शान से लहराते हुए चलते थे… आज हाथ कांपने लगे हैं… ईमानदारी ने आत्मविश्वास पर ज़बरदस्त चोट की है… और देश के विकास के लिए, उसके नागरिकों का आत्मविश्वासी होना बहुत ज़रूरी होता है…
आज सारा देश कह रहा है, "मैं भी अन्ना…" जो खा रहा है वो भी अन्ना कहता है, और जो खिला रहा है वो भी अन्ना है… जब सारा देश अन्ना है, तो भ्रष्ट कौन है…? जब एक अन्ना दूसरे अन्ना को नहीं खिलाएगा, तो कौन खिलाएगा… ?
अन्ना की वजह से, हमारी तो सारी पढ़ाई ही बेकार हो गई… हिंदी के Papers में हमने " जेब गरम करना" जैसे मुहावरों का अर्थ बता बता कर, कितने Marks हासिल किए थे… लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होते ही, ये सारे मुहावरे भी निरर्थक हो जाएंगे… टेबिल के नीचे से लेना, ऊपरी कमाई, रंगे हाथों पकड़े जाना… जैसे सारे वाक्य अचारक खत्म हो जाएंगे, जो अभी तक हमारी पढ़ाई लिखाई का एक हिस्सा थे…
अन्ना को क्या है… अन्ना को Passport नहीं बनवाना… उन्हें राशन कार्ड भी नहीं चाहिए… वो गाड़ी भी Drive नहीं करना… बच्चों का Admission भी नहीं कराना… और तो और वो 15 -16 दिन भूखे भी रह सकते हैं… इसलिए वेा बिना भ्रष्टाचार के रह सकते हैं… वर्ना उनसे कहिए… Agent को बिना 2500 रूपये दिए Driving License बनवा लें तो मान लेंगे देश में ईमानदारी आ चुकी है… या फिर जिन्होंने रामलीला मैदान में किरण बेदी का अभिनय देखा है… वे अपने अपने शहर में जाकर, सारे Traffic नियम पाल रहे होंगे, या लौटते समय, चालू टिकट लेकर, Reservation डब्बे में न घुसे होंगे … तो समझेंगे अन्ना सफल हो गए हैं, और भ्रष्टाचार खत्म हो गया है…
पर मानना पड़ेगा अन्ना को… भ्रष्टचार भले खत्म हो या न हो… उन्होंने देश के उस युवा वर्ग को कमरे से बाहर ला दिया, जो दिन भर Face book के बैठा बैठा… या तो Photo upload करता रहता था, या Chat में लगा रहता था… टोपी भले Fashion से ही सही, लेकिन Anna ने सबको टोपी पहना ही दी…
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