30 June 2012

"Bollywood का बवासीर"



बवासीर का दर्द कैसा होता है, मुझे नहीं मालूम, क्योंकि मुझे कभी नहीं हुआ.. लेकिन शायद कुछ वैसा ही होगा, जैसा की फिल्मी हस्तियों को Bollywood शब्द सुनकर होता है। कहते हैं, कि Bollywood मत कहो.. ये एकदम वैसा ही Reaction है, जैसे कि एक Serial "हम पांच" में एक अधेड़ महिला, Aunty कहने पर शिकायत करती थी, कि Aunty मत कहो.. उसी तरह से आजकल बड़े बड़े Super Stars, Directors, Writers कहते हैं, Bollywoo मत कहो। 

वैसे Bollywood शब्द न कहने देने के पीछे इनकी बहुत अच्छी सोच है। इन Anti Bollywood वाले लोगों का मानना है, कि ये शब्द ऐसा लगता है, कि जैसे हमने Hollywood से Copy कर लिया हो…। ह ह ह हंसी तो इतनी आ रही है, कि Blog में से हंसी की आवाज़ आने लगे.. ये तो गांव के ज़मीदार ठाकुर वाली बात हो गई, कि उसे नीची जाति की गांव की जवान लड़की के साथ हमबिस्तर होने में, उसका बलात्कार करने में परहेज नहीं है, लेकिन उसे अपने कुंए से पानी नहीं भरने देगा..

इन्हें Hollywood की Copy Bollywood से परहेज है, लेकिन Hollywood की पूरी कहानी, उनके Heros के Look, उनकी DVD और यहां तक कि उसके Posters की Copy करने में कोई परहेज नहीं है।
इन्हें Bollywood सुनने में दर्द होता है, लेकिन हिंदी में बात करने में गर्व नहीं होता। इन्हें हिंदी फिल्म जगत कहना पसंद है..लेकिन हिंदी की Script, English में पढ़ना अच्छा लगता है। जो Bollywood इन्हें Hollywood की Copy नज़र आता है, उसी Hollywood के लिए एक Extra बनने में ये जान लगा देते हें।

मैंने एक Bollywood विरोधी को पकड़ा और पूछा कि आखिरी क्या बात है, Bollywood में ऐसी कौन सी मिर्ची लगी है, जो सुनते ही जलन होने लगती है..। उनके श्रीमुख से जो शब्द निकले वो शायद आसाराम बापू या रामदेव भी बताने में असमर्थ रहते..। वे कहते हैं  "इस देश की एक महान संस्कृति रही है, कि जिसका खाओ, उसी की बजाओ..। इस नीति से बहुत भला होता है। एक तो खिलाने वाले का एहसान नहीं चढ़ता, चढ़ेगा भी कैसे, जिसने खाना खिलाया, अगर उसी के खाने की बुराई कर दी जाए, तो खिलाने वाला "नमक का कर्ज़" जताने की बजाए, Backfoot पे चला जाता है, उसे लगता है, कि उसने गंदा खाना खिला दिया। इसीतरह यदि Hollywood पे Based Bollywood की इतनी बुराई कर दी जाए, कि Hollywood को भी लगे कि ये हिंदी फिल्म वाले हमसे चिड़ते हें, तो ये बेचारे हमारी फिल्मों को क्या चुराते होंगे..।"

फिर एक नई नवेली अभिनेत्री थीं, जिनसे मैंने Hollywood Bollywood विवाद के बारे में कुछ बात करने की ज़रूरत नहीं समझी थी, लेकिन फिर भी उन्होंने जबरदस्ती अपनी राय को मेरे पीछे लगा दिया.. उनकी राय मुझसे बोली.. कि देखिए, फिल्मी दुनिया में किसी चिड़ना, cool होने की निशानी है.. अगर आप Anurag हैं, और Amitabh से चिड़ते हैं, यानि आप Cool हैं, अगर आप Salman हैं, और Press से चिड़ते हैं, तो भी cool हैं.. अगर आप RamGopal Varma हैं, और Karan Johar से चिड़ते हैं, तो Super cool हैं, इसीलिए आपको अगर फिल्म Line में cool बनना है, तो Bollywood शब्द से बहुत बुरी तरह से चिड़ना होगा..

ये तर्क सुनकर मुझे भी Bollywood से बहुत चिड़ होने लगी, और जैसे ही मुझे चिड़ मची, तो मुझे अपने अंदर एक ठंडक का एहसास हुआ.. और ये Mumbai का मौसम बदलने के कारण नहीं था, मैं अचानक Cool हो रहा था.. ठंडा ठंडा cool cool.. 
तभी अचानक किसी ने पीछे से कहा – भाई साब ये Bollywood में एक बहुत ही धांसू Hero आया है..
मैंने उसे घूर के देखा, और कहा Bollywood..? तेरी…

RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt.Ltd.
Mumbai

  

18 October 2011

Steve दादा नहीं रहे...

स्टीव दादा नहीं रहे... कौन Steve? अरे भई Apple वाले Steve Job दादा नहीं रहे… पूरी दुनिया में मातम छा गया... लोगों को अपने दादा के मरने का शायद उतना ग़म न हो, जितना Steve दादा का हुआ...। सब रोने लगे... जिनके पास भी iphone, iMac, ipad, ipod.. जो भी था, वो रो रहा था… अखवार रो रहे थे, Channel रो रहे थे... कुछ लोग इसलिए भी रो रहे थे, ताकि वो ये साबित कर सकें, कि वो भी Steve दादा का Product इस्तेमाल करते हैं…

लोग कह रहे थे, कि तीन सेवों ने यानि Apples ने दुनिया बदल दी… एक Apple Adam और Eve ने खाया था, तो दुनिया बन गई… दूसरा Apple Albert Einstein के सर पर गिरा तो दुनिया को गुरूत्वाकर्षण यानि Gravity का पता चला… तीसरा Apple Steve दादा का था, जिसने Computers और phone की दुनिया बदल दी… वो बात अलग है, कि पहले दो सेवों की करतूतों ने आम दुनिया को फायदा पहुंचाया, लेकिन Steve भईया के Apple का उन्ही लोगों को पता था, जो इस बात को मानते थे, An apple in a day keep doctors away… आम आदमी का तो Apple से तभी वास्ता पड़ता है, जब वो लड़की वाला बन कर लड़के वालों को सगाई के समय 1 किलो सेव भेंट देता है… इन एक किलो सेवों का महत्व सगाई की सोने की अंगूठी से कम नहीं होता…

तो अपने Steve भईया ने भी हमें एक Apple दिया… हांलांकि वो जूठा Apple था… कुतरा हुआ.. अब पता नहीं, कि वो Steve ने कुतरा, या फिर चूहे ने… लेकिन हम सब खुश होते रहे… कि भले जूठा हुआ तो क्या हुआ, किसी ने हमें सेव लायक तो समझा… और हम Steve भईया के जूठे Apple को पाकर खुश होते रहे… पहले Apple बड़े बड़े देशों में Launch होता, जब वो खा खा के थक जाते… तब जा के Apple भारत में आता… लेकिन हम खुश हो जाते… और मन को समझा लेते… कि कोई बात नहीं… पहले अमरीका और इंगलेंड Apple खा लें, फिर बचेगा तो हमें भी मिल जाएगा… Steve दादा ने कभी ये नहीं सोचा, कि भारत का बाज़ार भी बड़ा है, और वहां भी उनके सेव अच्छे खासे बिक सकते हैं… कुछ लोगोँ को तो Apple खाने का इतनी तलब लगती… कि वो चोरी छिपे लाया हुआ Apple ही खा लेते… और उसे बड़ी शान से हाथ में लेकर घूमते, और बताते भी, कि ये वही Latest Apple है, जिसे India में launch करने लायक नहीं समझा गया, लेकिन उन्होंने किसी तरह जुगाड़ कर लिया है… और उसे Break करके वेा इस्तेमाल भी करने लगे हैं… बचपन में चुरा के तो हमने भी Apple खाए हैं, लेकिन हमेशा कोशिश यही थी, कि किसी को पत न लग जाए… लेकिन ये Steve भ्ईया का Apple था, कोने के ठेले वाले बंसी लाल का नहीं…

लेकिन कुछ भी हो, Steve दादा के जाने का दुख हमें भी हुआ… अनाथ थे, लेकिन आदमी अच्छे थे… भारत भी आ चुके थे, हांलांकि भारत में उनके अनुभव ज्यादा अच्छे नहीं रहे… सुनते हैं, उस समय उन्हें किसी सन्यासी ने ठग लिया था… वैसे ये बात नई नहीं थी, सन्यासी हमेशा से ही लोगों को ठगते आ रहे हैं, कभी धर्म के नाम पर, तो कभी चमत्कार के नाम पर… पर Steve दादा को इस बात का दुख हुआ, और उन्होंने फिर कभी पलट कर यहां नहीं देखा… हो सकता है, इसीलिए… उनके Apple सारी दुनिया में तो बिकते, लेकिन भारत में देर से ही आते… ठीक वैसे… जैसे कोई नई फिल्म शुक्रवार को तो महानगरों में release होती हैं, लेकिन गांव खेड़ों के सिनेमा Hall में दो चार हफ्ते के बाद ही पहुंचती है… Steve दादा के लिए, भारत भी किसी गांव खेड़े से कम नहीं था…

हमारे हिसाब से Steve दादा की बनाई हुई चीज़ों में बहुत सी कमियां थीं… लेकिन हालत ऐसी कि मज़ाल है कोई कमियां निकाल दे… लोग ऐसे react करते, जैसे किसी को Modern Art समझ नहीं आती, या English Film जिन्हें समझ नहीं आती, तो दूसरे उसे कैसी हीन भावना से देखते हैं… भले उन्हें भी समझ न आई हो… मैंने एक Apple fan से पूछा, कि भाईसाब, आपके Phone में तो कुछ Basic Feature ही Missing हैं… तो उसने मुझे ऐसे देखा, जैसे नाके के किसी पनवाड़ी ने MF Husssain की Painting खरीद ली हो… बोला, अगर Apple खाना है, तो जैसा है वैसा खाओ…

Steve दादा की सफलता का यही आलम था… जैसे हम अपनी कमियों को ऊपर वाले की कृपा मानकर संतोष कर लेते हैं, कि ऊपरवाले ने अगर टांग तोड़ दी है, तो कुछ सोच कर ही तोड़ी होगी… क्योंकि भगवान जो कुछ करता है अच्छा ही करता है… उसी तरह Steve दादा जो बनाते हैं, अच्छा ही बनाते हैं… ये स्थान प्राप्त कर लेना, जिंदगी में बहुत बड़ी उपलब्धि है, कि जब लोग आपकी कमियां मानने और देखने को तैयार न हों… ये चमत्कार Steve दादा ने कर दिखाया, ये वाकई बहुत बड़ी बात है… मैं Steve दादा का Fan नहीं रहा, लेकिन वो जहां भी हैं, जैसे भी हैं, उन्हें बहुत बहुत श्रृद्धांजलि…

Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011

23 September 2011

नाक के बाल

सदियों तक गुमनामी के अंधेरे, पिछड़ेपन, और इंसानी उपेक्षा में जीने के बाद, अचानक एक दिन, नाक के बालों ने विद्रोह कर दिया…। दबा हुआ दर्द विद्रोह बन कर फूट पड़ा… नाक के बालों ने नाक में दम कर दिया…। उनका एक मुखिया बाल बढ़कर… नाक से मूंछों तक पहुंच गया… और कहने लगा… "इंतज़ार, धैर्य, सहने की भी हद होती है… सदियां हो गईं, इंसान की नाक की तंग, अंधेरी और सीलन भरी गलियों में सड़ते हुए… आजतक इंसान ने हमारे बारे में कुछ सोचा…? तुम्हारे सर के बालों की तरह हम भी बाल है… पर हमें इतने सालों से इंसान की नाक में रह कर क्या मिला…? सिर के बालों को इतना मान और हमें अपमान…? सर के बालों के लिए तरह तरह के तेल, Lotion Cream, conditioner… और हमें… बहती हुई नाक का गटर…?


सिर क्यों… हमसे कुछ ही दूरी पर, मूछों के बाल… उन्हें एंठकर तुम अपनी मर्दानगी दिखाते हो… और वहां से थोड़ी ही दूर पर हम ऐसे… जैसे अंबानी की इमारत के आसपास झुग्गी झोपड़ी… आखिरी बाल से बाल का भेदभाव क्यों… ? हम वो बाल हैं, जो तुम्हारी सांसों में धूल, कचरे को तुम्हारे फेंफड़ों तक पहुंचने से रोकते हैं, वर्ना अब तक दम घुट कर मर गए होते…? सर के बाल बढ़ते हैं, तो तुम उनको संवार कर, अपनी Style पे इतराते हो… लेकिन हम बढ़कर नाक से झांकने भी लगें तो तुम कैंची अंदर तक घुसा कर हमारी गर्दनें काट देते हो, क्यों? अपनी नाक की शान तो तुम्हें इतनी है कि अगर तुम्हारी नाक पे बात आ जाए, तो तुम किसी की जान लेने में नहीं हिचकिचाते… फिर नाक के बालों की इतनी तौहीन क्यों…? "


मैंने नाक के बढ़े हुए बाल को प्यार से सहलाया, थोड़ा बहलाया, और बोला… "भाई मेरे हमारे मन में बाल के प्रति कोई भेदभाव नहीं है… दरअसल हमारा तुम पर आज तक ध्यान गया ही नहीं…।" वो बोला… "आखिर जाएगा भी कैसे… जो हम तुम्हारे Vote bank नहीं हैं न.. हम तुम्हारी सुंदरता में इज़ाफा नहीं करते, हम माथे पर बिखरकर तुम्हारी जुल्फें नहीं कहलाते… तुम लोग उन्हीं पर ध्यान देते हो… जो तुम्हारे सामने हैं… जिनसे तुम्हारी Image बनती है… लेकिन वो तुम्हारे लिए कोई मायने नहीं रखते, जो तुम्हारे आगे लहराते नहीं है… अगर ऐसा ही होता… तो आसाम, मणिपुर, मिजोरम, अरूणाचल जैसे राज्य भी उसी तरह इतराते जैसे MP UP राजस्थान इतराते हैं… दरअसल तुम्हारे लिए, पूर्वी राज्य भी नाक के बाल ही हैं…"


मैंने कहा – "नहीं यार, हम क्या करें… हम क्या करें… हमने तुम्हें नाक के अंदर थोड़े ही डाला है, ये तो ऊपर वाले ने तुम्हें वहां जगह दी है…।" बाल बड़े ताव में बोला.. "वाह, अब भगवान के ऊपर ठीकरा फोड़ दिया… अरे भगवान ने तो भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता, भेदभाव, अत्याचार, इन सबको तुमसे दूर रखा था, उसे तो तुम कहां से उठाकर अपने पास ले आए…। तुम लोगों को जब भी मौका मिलता है, तुम अपने हिसाब से चीज़ें जमा लेते हो… तब भगवान याद नहीं आते… आज भगवान की दुहाई दे रहे हो…?"


अब वो गुस्सा कम और दुखी ज़्यादा लग रहा था… ऐसा लग रहा था, जैसे उसकी आंखें नम हो गई हों… उसने कहा – "हमने आज तक कोई Demand नहीं की… हम जिंदगी भर तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल वक्त आने पर झड़ जाते हैं… लेकिन हम आखिर तक तुम्हारा साथ निभाते हैं… सर के बाल, मौका मिलते ही अपना रंग बदल लेते हैं… लेकिन हम आखिरी दम तक काले रहते हैं… फिर भी हमारे बारे में तुमने एक पल भी नहीं सोचा होगा…"


मैने अपनी उपेक्षा को एक Philosophy का रंग देने की कोशिश की… मैंने कहा कि – "देखो, इमारत के कंगूरे की हर कोई तारीफ करता है, लेकिन ईमारत जानती है, कि अगर वो आज सीधी खड़ी है, तो नींव के पत्थरों की वज़ह से…।" वो एकदम से भड़क गया… बोला.. "कब तक ये बातें कर कर के मेहनत करने वालों को उल्लू बना कर जिंदगी भर गढ्ढे में धकेलते रहोगे…? तुम्हारी इसी फालतू Philosophy की वजह से कंगूरे के पत्थरों की तरह चापलूस लोग, दुनिया की चकम दमक में जिंदगी भर फायदे की मलाई खाते हैं… तारीफ पाते हैं, और अपनी चमकीली किस्मत पे इतराते हैं… और मेहनती नींव के पत्थर सदियों से ज़मीन के नीचे दफन पड़े होकर खुश होते रहते हैं, कि वो इमारत को खड़ा रखे हैं… वो बुद्धू ये नहीं जानते हैं, कि उन्हें वेवकूफ बनाया गया है… और बलिदान का पाठ पढ़ाकर, प्यार से दफनाया गया है…"


नाक के बाल के तर्को के आगे मेरी नाक झुक चुकी थी… ऐसा लग रहा था, कि अब ये बाल मेरी सांसें बंद कर देंगे… लेकिन नाक के बाल ने वापस नाक में घुसते हुए कहा… "ये ज़रूरी नहीं, कि तुम हमें सर पे बिठाओ… लेकिन इतना ध्यान रखो, कि जो तुम्हारी पीठ पीछे मेहनत करते हैं, उनको भी कभी कभी याद कर लिया करो… आखिर नींव के पत्थर भी सांस लेते हैं…!!"

Written by : RD Tailang
© Sequin Entertainment Pvt. Ltd. 2011

19 September 2011

KBC 5 Opening Speech 16 Aug 2011

आज मैंने कौन बनेगा करो़ड़पति की शुरूआत में, श्री अमिताभ बच्चन के लिए ये पंक्तियां लिखीं… वो KBC के Set पे आकर, ये पंक्तियां बोलते हैं…

मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है… यूं तो मैं, देश के कोने कोने में घूमा फिरा… कभी देखा एक छोर, तो कभी छुआ दूसरा सिरा… मगर मैंने हिंदुस्तान यहां महसूस किया है…

हमें जो लाखों Calls मिले, वो महज़ आकड़े नहीं थे… उसमें थी मंज़िलें, किसी के सपने यहीं थे… किसी में छिपी थी मां की बीमारी… कोई बच्चे को दिखाना चाहता था दुनिया सारी… इस खेल ने जीवन को कितना दिया है… मैंने यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…

यहां खिलाड़ी साथ लाता है अपना गांव… पीपल की छांव, कौवे की कांव कांव… शहरों की रंगत भी यहां आती है… गांव की संगत में वो भी खिलखिलाती है… यहां सबके सपने एक होते हैं… एक की हार पे, दिल सभी के रोते हैं… ये खेल जब भी आता है, किसी का घर बन जाता है, कोई कर्ज उतर जाता है, कहीं जीवन संवर जाता है... इस खेल ने जीवन को कितना दिया है, मैं यहां हिंदुस्तान महसूस किया है…

मी भ्रष्ट आहे

और एक दिन वही हुआ, जिसका मुझे डर था… अचानक अन्ना ने आंदोलन छेड़ दिया… कि अब इस देश में भ्रष्टाचार नहीं चलेगा… दिल पे गाज़ तो गिरनी ही थी… भ्रष्टाचार की जिस संस्कृति में हम पैदा हुए, पले, बढ़े, जवान हुए... उसके विकास में अपना भी योगदान दिया… अन्ना ने आकर अचानक उसे बुरा कह दिया और बोला कि आज से ऐसा करना खराब है… ये तो वही बात हो गई… कि जिस पत्नी के साथ इतने दिनों गुज़ारे हों… पड़ौसी आकर एक दिन बोल दे.. कि वो तो डायन है… मन कैसे मानेगा इस बात को… पर अन्ना कह रहे हैं, इसलिए मानना भी पड़ा, कि भ्रष्टाचार हमारे लिए वाकई बुरा है…

अन्ना से पहले हमें अपने भ्रष्टाचारी होने पर कितना गर्व था… हमारा आत्मविश्वास किस हद तक ऊंचा था, हम बिना Insurance की गाड़ी बेधड़क चलाते थे… क्योंकि हमें विश्वास था, कि अगर पकड़े जाएंगे, तो 50 रूपये से ज़्यादा नहीं लगेगा… देश का ऐसा कौन सा युवा है, जिसने बिना Driving License की गाड़ी नहीं चलाई हो… कभी पकड़े भी गए… तो 20 रूपये से ज़्यादा किसी हवलदार ने Demand नहीं की… आज स्थिति बिल्कुल बदल गई है, हर टोपी वाला हवलदार अन्ना नज़र आता है… गाड़ियां निकालने में डर लगता है… वो 50 रूपये वाला आत्मविश्वास खत्म हो गया है… पहले Road पे बिना Papers की गाड़ी भी जिस शान से लहराते हुए चलते थे… आज हाथ कांपने लगे हैं… ईमानदारी ने आत्मविश्वास पर ज़बरदस्त चोट की है… और देश के विकास के लिए, उसके नागरिकों का आत्मविश्वासी होना बहुत ज़रूरी होता है…

आज सारा देश कह रहा है, "मैं भी अन्ना…" जो खा रहा है वो भी अन्ना कहता है, और जो खिला रहा है वो भी अन्ना है… जब सारा देश अन्ना है, तो भ्रष्ट कौन है…? जब एक अन्ना दूसरे अन्ना को नहीं खिलाएगा, तो कौन खिलाएगा… ?

अन्ना की वजह से, हमारी तो सारी पढ़ाई ही बेकार हो गई… हिंदी के Papers में हमने " जेब गरम करना" जैसे मुहावरों का अर्थ बता बता कर, कितने Marks हासिल किए थे… लेकिन भ्रष्टाचार खत्म होते ही, ये सारे मुहावरे भी निरर्थक हो जाएंगे… टेबिल के नीचे से लेना, ऊपरी कमाई, रंगे हाथों पकड़े जाना… जैसे सारे वाक्य अचारक खत्म हो जाएंगे, जो अभी तक हमारी पढ़ाई लिखाई का एक हिस्सा थे…

अन्ना को क्या है… अन्ना को Passport नहीं बनवाना… उन्हें राशन कार्ड भी नहीं चाहिए… वो गाड़ी भी Drive नहीं करना… बच्चों का Admission भी नहीं कराना… और तो और वो 15 -16 दिन भूखे भी रह सकते हैं… इसलिए वेा बिना भ्रष्टाचार के रह सकते हैं… वर्ना उनसे कहिए… Agent को बिना 2500 रूपये दिए Driving License बनवा लें तो मान लेंगे देश में ईमानदारी आ चुकी है… या फिर जिन्होंने रामलीला मैदान में किरण बेदी का अभिनय देखा है… वे अपने अपने शहर में जाकर, सारे Traffic नियम पाल रहे होंगे, या लौटते समय, चालू टिकट लेकर, Reservation डब्बे में न घुसे होंगे … तो समझेंगे अन्ना सफल हो गए हैं, और भ्रष्टाचार खत्म हो गया है…

पर मानना पड़ेगा अन्ना को… भ्रष्टचार भले खत्म हो या न हो… उन्होंने देश के उस युवा वर्ग को कमरे से बाहर ला दिया, जो दिन भर Face book के बैठा बैठा… या तो Photo upload करता रहता था, या Chat में लगा रहता था… टोपी भले Fashion से ही सही, लेकिन Anna ने सबको टोपी पहना ही दी…

12 March 2011

चंद ज़िदा लाशों के बीच, एक मरी हुई लाश

मुंबई में जिदंगी को, कितना व्यस्त और बेदर्द बनना पड़ता है। यहां किसी की मौत भी दिल को नहीं झिंझोड़ पाती। ऐसा ही हुआ… एक दिन सुबह चंडीगढ़ जाना था, Flight पकड़नी थी... Building से नीचे उतरते ही देखा तो सामने एक लाश पड़ी थी… कोई मर गया था, या कोई मार के फेंक गया था… लेकिन आसपास किसी को कोई परवाह नहीं थी। इडली वाली इडली बेच रही थी, खाने वाले खा रहे थे, रिक्शे वाले अपने ग्राहकों का इंतज़ार कर रहे थे… और मैं मरने वाले की चिंता में नहीं, मिलने वाले Traffic की चिंता में चिंतित, रिक्शे में बैठकर चल दिया… लेकिन अपने दिल की भावनाओं को इस कविता में व्यक्त करता रहा, जब तक Airport नहीं आ गया… शायद आपको अच्छी लगे…!!


लाश पड़ी फुटपाथ पे, न ठीका न ठौर,
मुर्दो के इस शहर में, चलो मरा एक और !!

चलो मरा एक और किसी को कहां पड़ी है
धनवानों के बीच, कफन बिन लाश पड़ी है !!

लाश ही बनना था तो, क्यूं इस शहर में आया
ये सूरज खाऊ भवन, न देंगे तुझको छाया…!!

तेरी मैय्यत के पीछे, मैं क्यूं छोड़ूं धंधा…
खुदगर्जों के बीच में साला ढूंढ रहा है कंधा…!!

कंधे को तो यहां चूतिए, बाप तरस जाते हैं…
अब तो कंधे रोने के भी काम कहां आते हैं…!!

काम हुआ न जीते जी, वो अब मरने पे होगा
मुर्दाघर ही सही, शहर में तेरा घर तेा होगा…!!

तुझको भी इस शहर में वैसे, अच्छा मान मिला
जीने तक फुटपाथ मिला, मर के कब्रिस्तान मिला !!

अब जीने की ख्वाहिश हो, तो अपने घर जाना
आंचल, आंगन, ऊंगली, कंगन छोड़ यहां न आना…!!

पेट भले भर लेगा तू, पर दिल तो वहीं भरेगा…
वर्ना कहीं किसी कोने में, लावारिस ही मरेगा…II

© RD Tailang 2011.

02 December 2010

KBC के शुरूआती दिन...

Film City Mumbai का Floor No 7. जी हां, Filmcity Mumbai में बहुत ही खूबसूरत जगह है, जहां पर फिल्मों की Shooting होती है। ये जगह ऐसी है जहां चारों तरफ हरियाली और जंगल है… Borivali National Park से लगा होने के कारण, यहां पर कभी कभी रात को चीता और जंगली जानवर भी आ जाते हैं… इसी हरियाली के बीच में बड़े बड़े खाली Hall बने हैं, जिन्हें फिल्मी भाषा में Floor कहा जाता है। ये FCI के गोदाम की तरह होते हैं… लोग इन्हीं के अंदर, अपनी फिल्मों के, या TV Shows के Set लगा लेते हैं… और Film City के ऐसे ही एक Floor No 7 में KBC 2000 का Set लगाया गया था।

Set पूरी तरह बन कर तैयार हो चुका था… Set ऐसा कि देखते ही बनता था… कांच का कटोरा जैसा लगता था… पैरों तले कांच होने के कारण शुरू में बहुत दिक्कत आती थी… सबको लगता था, कि पैर रखते ही चटक जाएगा और हम नीचे कटोरे में गिर जाएंगे… ये Set भारत के बहुत ही मशहूर Art Director Nitin Desai ने लगाया था।

भारत में इस तरह की Lighting और High tech Show की शायद वो शुरूआत ही थी, ऐसा लगता था, जैसे कि Rocket launching Control room में हों… Control Room एक बड़ा कमरा होता है, जहां पर सारी Lights के Computer के और Sound के Control होते हैं, और Director भी यहीं बैठता है… हमारे Control Room में कमरे तो थे, लेकिन छत नहीं थी… क्योंकि हम वैसे भी Floor No 7 की छत के नीचे ही तो बैठे थे… लेकिन उसके बाद हमें छत की ज़रूरत पड़ गई… पहली बार हमें पता चला कि शांत से दिखने वाले Siddhartha Basu अचानक कुछ सही न होने पर इतनी ज़ोर से चिल्ला पड़ते थे, और वो आवाज़, Floor पर खेल खेल रहे Amitabh Bachchan को चौंका देती, वो डर के मारे खेल रोक देते… तभी लगा कि हमारे Control Room छत की बहुत ज़रूरत है, और रातों रात छत बनाई गई… तब जाके इस समस्या से छुटकारा मिला… लेकिन Sidhartha Basu की ख़ासबात ये भी थी, कि यदि एक Second में उनको गुस्सा आता था, तो आधे Second में उनका गुस्सा उतर भी जाता था… और वो ऐसे लगते कि, जैसे इन्होंने ऊंची आवाज़ में शायद बरसों से बात नहीं की है…

ख़ैर हम सब पहली बार एक बड़ा Show कर रहे थे, एक दूसरे से उतनी जान पहचान भी नहीं थी, धीरे धीरे एक दूसरे की आदतों, स्वभाव, योग्यता के बारे में धीरे धीरे पता चल रहा था… और इसी दौरान मुझे Amitabh Bachchan को समझने का मौका मिला…

Amit Ji, Rehearsals के लिए रोज़ आते, बड़ा मज़ेदार माहौल होता… हमने पहली बार देखा था, कि Amitabh Bachchan अपनी निज़ी ज़िदगी में कैसे हैं… हंसने हंसाने, मस्ती मज़ाक करने वाले Amitabh… उनके One liners का जवाब नहीं… इससे पहले हमने तो Amitabh को सिर्फ भूमिकाओं में देखा था, हम सब उनका ये रूप देखकर बहुत खुश् होते थे… जब भी उन्हें कोई कुछ ज्यादा करने को बोल देता तो वो कहते – हिटलर मर गए… लेकिन इन्हें छोड़ गए, हमारे लिए…। पहली बार हमें पता चला, कि Amit Ji लंबाई ज्यादा होने के कारण, 4 Plastic की कुर्सियों को एक के ऊपर एक रखकर बैठते हैं…। पहली बार पता लगा, कि Amit Ji Script सुनना नहीं, खुद पढ़ना पसंद करते हैं। उनकी लिखावट बहुत ही सुंदर और स्पष्ट है, और आज भी वो, अ अक्षर को पुराने Style में, यानि प के आगे तीन डंड़ियां लगा कर ही बनाते हैं… इसी दौरान Amit के साथ हुए एक वाकए ने मेरी ज़िदगी का नज़रिया बदल दिया…

[ Photo : एक बहुत ही Rare Photograph KBC 1 के Set पर Rehearsals के समय लिया गया, इसमें Amit Ji Team Member के साथ् Rehearsals करते हुए। Hood वाली Dress में Amit Ji बहुत Funny लग रहे हैं,। ]

दरअसल हुआ यूं, कि TV में अन्य कलाकारों में से जिसके लिए भी मैने लिखा, किसी ने Script पर इतना ध्यान नहीं दिया… इसलिए मेरी थोड़ी सी लापरवाही, या कहें तो आदत खराब हो गई… मैंने कभी `व' और `ब' में, ख और ख़ में फर्क़ ही नहीं किया… Movers and Shakers लिखता था, और वहां Shekhar Suman इन सब बातों पर ध्यान भी देते थे… लेकिन वो Shooting से पहले ख़ुद ही, ये Correction, Teleprompter पर कर लेते थे…

Bachchan जी जैसे ही Set पर घुसते, सबसे पहला सवाल करते कि Script लाओ… मैं इसके लिए तैयार नहीं रहता… फिर फटाफट Printout निकाले जाते… उसके बाद, Script लेकर पहुंचता तो हिंदी की Grammar के ठिकाने नहीं रहते… ऐसा नहीं कि ज्ञान नहीं था, लेकिन लापरवाही, कि कौन करे, भला बिल्ली को विल्ली लिख देंगे, फिर भी बोला तो बिल्ली ही जाएगा… Amit Ji ने, एक दो बार तो खुद ही अपनी तरफ से ये ग़लतियां ठीक कर दीं… लेकिन Teleprompter में वो सुधार उतने Seriously नहीं हो पाते थे… Bachchan Sir बोलते, तो मैं Sorry कहके बच जाता… मुझे मन ही मन ये लगता, कि ठीक है, हम यहां कोई Hindi का Exam देने थोड़े ही आए हैं, जहां Amitabh Bachchan हमारी ग़लतियां निकालें और सुधारते फिरें… वो Anchor हैं, Master Ji नहीं…। एक दिन फिर वही हुआ… फिर ग़लतियां… तो इस बार Bachchan Ji ने, थोड़े प्यार से, थोड़ी चिड़ के साथ, और थोड़े गुस्से से… मुझे लताड़ दिया… बोले मैं तीन चार दिन से देख रहा हूं वही ग़लतियां बार बार हो रही हैं, तुम्हें समझ नहीं आ रहा है, कि जैसा तुम लिखोगे, मैं वैसा वहां बोलूंगा, और यदि मैं सबके सामने ग़लत बोलता हूं, तो रात को ढंग से सो नहीं पाता… और अगर आज की ग़लती तुम आज नहीं सुधारोगे, तो वो आदत बन जाएगी, और जो एक बार आदत बन जाती हैं, वो बड़ी मुश्किल से छूटती है…

ये Lecture सुनकर मैं बाहर आ गया, मैं भी गुस्से में था… आख़िरकार ये तो हद दी… मैं भी Writer हूं, यहां डांट खाने नहीं आया… सोचा Show छोड़ दूंगा… दोस्तों के बीच खूब बड़बड़ाया… मुझे ऐसा लगा कि बाहर का आदमी… क्योंकि वो फिल्मों से आए थे, हमारे ऊपर धौंस जमा रहा था… लेकिन अचानक न जाने क्या हुआ… दिमाग में एक रोशनी सी कौंधी… Amit Ji की एक एक बात कानों में गूंजने लगी… उन्होंने अनजाने में, जीवन की एक बहुत बड़ी सीख दे दी थी… अगर मुझे जीवन में आगे बढ़ना है, तो इस सीख को तो सीखना ही पड़ेगा… बात सही थी, ग़लती को आदत क्यों बनने दिया जाए… उन्होंने मेरे लेखन पर ऊंगली नहीं उठाई थी, उन्होंने मेरी लापरवाही पर टोका था… और हो सकता था, कि उस लापरवाही की वजह से, मेरी अच्छी Lines का मज़ा भी ख़राब हो जाता हो…
मैंने जीवन में इस घटना को मार्गदर्शक बना लिया… और उसके बाद, तो ग़लतियां ऐसी सुधरी… कि आज Amit Ji से जुड़े हुए दस साल हो रहे हैं… और इन दस सालों में उन्होंने Television पर जो भी किया, उसका हिस्सा में रहा हूं…

आज एक घटना को काफी विस्तार से लिख दिया है, कल कुछ और दिलचस्प वाकये सुनाऊंगा… तब तक के लिए, शुभजीवन की शुभकामनाएं।

RD Tailang
Mumbai